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शनि देव के क्यों नहीं करने चाहिए , सीधे दर्शन

शनि देव का नाम सुनते ही सभी के मन में भय व्याप्त्य हो जाता है ,क्योकि शनि देव को न्याय प्रिय देवता कहा जाता है। ये सभी को सामान रूप से न्याय प्रदान करते है। पुराणों में इनके बारे में बहुत से किस्से – कहानियां विद्यमान है जो कि आप को शनि महाराज अथार्त शनि देव को न्याय प्रिय देव के रूप में दर्शाती है।

पुराणों के अनुसार शनि भगवान् , भगवान् सूर्य और छाया के छोटे पुत्र है। यह बचपन से अपनी माता के अति प्रिय रहे है, और इसी कारण यह थोड़े हटी और न्याय प्रिय भी है। इनका विवाह चित्ररथ की कन्या से हुआ था , यह बचपन से ही भगवान् श्री कृष्ण के भक्त रहे थे। इनकी पत्नी बहुत बड़ी सती-साध्वी और परम तेजस्विनी थीं।

एक समय की बात है जब शनि महाराज अपने ध्यान मग्न थे तब शनि महाराज की पत्नी पुत्र रत्न की प्राप्ति के लिए उनके पास जाती है लेकिन बहुत आवाज देने पर भी शनि महाराज का ध्यान भंग नही होता है। बहुत परिश्रम करने पर भी शनि जी की आँखे नही खुलती। जिससे उनकी पत्नी क्रोधित हो जाती है और उनको श्राप दे देती है कि ” आज के बाद जब किसी पर आप की सीधी दृष्टी पड़ जाएगी , उसका विनाश हो जायेगा। वह पूरी तरह से नष्ठ हो जायेगा।

यह कटु वचन सुन कर शनि देव की आँखें खुलती है तो वह अपनी पत्नी से दिए गए श्राप के लिए क्षमा मांगते है लेकिन मुख से निकला श्राप बाण की तरह होता है वापस नही लिया जाता है , लेकिन उनकी पत्नी उस श्राप के दोष को कम करने के लिए कुछ उपाय जरूर बता दिये। उन्होंने बोला आप की जिस पर वक्र दृष्टि  होगी उसका आप के इस कु-प्रभाव कोई असर नही होगा , उस पर आप की दया दृष्टि  बनी रहेगी।

ज्योतिषशास्त्र के अनुसार यह यदि रोहिणी-शकट भेदन कर दें तो पृथ्वी पर 12 वर्ष का अकाल पड़ जायेगा यह योग महाराज दशरथ के समय पर हुआ था उन्होंने अपनी सेना लेकर शनि महाराज से युद्ध करने पृथ्वीवासीयो के लिए नक्षत्र मंडल में चले गए थे। जब यह बात शनि देव को पता चली तो वह बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने महाराज दशरथ को बुलाया और बोला “बोलो क्या वरदान मंगाते हो।”
राजा दशरथ ने वरदान स्वरुप माँगा कि ” जब तक ब्रमांड में सूर्य और नक्षत्र रहेंगे तब तक आप शटक-भेदन ना करें। ” उन्होंने राजा दशरथ की बात में ली और उनको वरदान दे दिया।

जय शनि महाराज

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